साथी........
मन में एक उलझन, एक कशमकश सी है कहीं......
हैं कई आस - पास -, पर ऐसा कोई नहीं .......
जो पढ़ सके खामोशियाँ .....
जो भांप सके सन्नाटे की गहराइयाँ ..
जो देख सके वो, अनदेखा किया सभी ने जो !!!
सहला सके उस मन को , काँप उठता है हवा के झोंके से जो ....
पोंछ सके उन आसुओं को , भूल गए हैं सूखना जो....
चूम सके उन होटों को , मुरझा गए है सुनाते दर्द की दास्तान जो ....
लौटा सके उस चेहरे की मुस्कराहट, मुखौटा पहने हँसता हैं जो .......
डूब सके उन आखों की गहराई में, तलाश रही हैं किसी अपने को जो .......
क्या है कोई ऐसा ??
किस गलियारे में छिपा है वो ???
कहाँ बस्ता है वो ..??
क्या वो है भी ? या है ये बस मेरी कल्पना ??
पर ..........
क्या मेरी मांग बहुत बड़ी है ??
समझाना चाहिए मुझे व्याकुल मन को ?
कि-
" हैं इस दुनिया में लोग अपार .........मगर
कोई नहीं होता अपना एक सीमा के पार ......!!!
आप ही अपने हैं ....सबसे अपने.......!!!
कोई नहीं है उतना अपना इस संसार में ...!!
समझ सके जो आपको आप से ज्यादा .......!!
दे सके जो सदा साथ रहने का वादा ..!!! "
इंतज़ार व्यर्थ है उस अपने का .....
क्योंकि वो तो सदा ही मेरे साथ है .....!!!
वो और कोई नहीं ....मेरा स्वयं है ......
जो मेरे साथ था....!! है ...!!! और रहेगा ....!!! सदा सदा के लिए ....!!
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